Thursday, 24 September 2015

मन और शान्ति

मनुष्य का मन अद्भुत है।  वही है ,रहस्य संसार का और मोक्ष का। पाप और पुण्य , बंधन और मुक्ति , स्वर्ग और नर्क सब उसमें समाये हुए हैं। अँधेरा और प्रकाश सब उसी का है।  उसमें ही जन्म है, उसमें ही मृत्यु है।
मन सब कुछ है।  सब उसकी लीला और कल्पना  है।  वह खो जाय, तो सब लीला विलीन हो जाती है।
‘मन तो बड़ा चंचल है , वह खोये कैसे ??
मन तो बड़ा गन्दा है , वह निर्मल कैसे हो ?

मन और शांति 

इस विषय में ओशो इक बुद्ध की कहानी कहते हैं।
बुद्ध जब बृद्ध हो गए थे , तब दोपहर एक वन में एक वृक्ष के नीचे विश्राम को रुके थे।  उन्हें प्यास लगी तो आनंद पास के झरने पर पानी लेने गया था।  पर झरने पर अभी अभी गाड़ियां निकली थीं और उसका पानी गन्दा हो गया था।  कीचड ही कीचड और सड़े पत्ते उसमें उभर आये थे।  आनंद उसका पानी लिए बिना लौट आया।  उसने बुद्ध से कहा, ’ झरने का पानी निर्मल नहीं है।  मैं पीछे लौट कर नदी से पानी ले आता हूँ। ’
नदी बहुत दूर थी।  बुद्ध ने उसे झरने का पानी ही लाने लौटा दिया।  आनंद थोड़ी देर में फिर खाली लौट अाया।  पर बुद्ध ने उसे इस बार भी वापस लौटा दिया।  तीसरी बार आनद जब झरने पर पहुंचा , तो देखर कर चकित हो गया।  झरना अब बिलकुल निर्मल और शांत था। कीचड बैठ गयी थी और जल बिलकुल निर्मल हो गया था। 
यही स्थिति मन की भी है।जीवन की गाड़ियां उसे गन्दा कर जाती हैं।  पर कोई उसे शांति और धीरज से उसे बैठा देखता रहे, तो कीचड अपने से नीचे बैठ जाता है। केवल धीरज की बात है  और शान्ति प्रतीक्षा की और ’ बिना कुछ किये ’ मन की कीचड बैठ सकती है। केवल साक्षी होना है और मन निर्मल हो जाता है।  मन को निर्मल करना नहीं होता है।  उसे तो केवल किनारे पर बैठ कर देखें  और देखें कि क्या होता है ! :सादर नमस्कार

Tuesday, 22 September 2015

मंगल दोष, परिहार और भ्रम



नमस्कार, मैं आज आपको मंगल योग के बारे में फैले भ्रम को बता रहा हूँ। पहले तो आप जानिये मंगल दोष या योग होता क्या है ?

कुंडली मांगलिक है या  नहीं ?
1-4-7-8-12 भाव में मंगल के होने पर कुंडली को मांगलिक कहा जाता है।  शास्त्रीय नियम है की मांगलिक व्यक्ति का विवाह मांगलिक व्यक्ति से करना चाहिए।   अनुभव मैं पाया गया है कि मांगलिक व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होता है।  परन्तु यदि वर-कन्या दोनों मांगलिक हों तो व्यवहाहिक जीवन बहुत सुखद रहता है।  
अब यहां पर बहुत ही महत्वपूर्ण बात का उल्लेख कर रहा हूँ।  1-4-7-8-12 वें भाव में मंगल के होने के बाद भी विभिन्न  परिस्थितियों में कुंज-दोष या  मंगल दोष समाप्त हो जाता है।  कुछ प्रमुख स्थितियां है :-
1- यदि वर-कन्या की पत्रिका में जिस भाव में मंगल हो अवं अन्य कोई प्रबल पाप ग्रह भी उसी भाव में हो ,तो मंगल दोष समाप्त हो जाता है। 
2- यदि वर-कन्या की कुंडली के 1-4-7-8-12 भाव में शनि हो  तो  भी मंगल  दोष परिहार होता है। 
3- मंगल पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो। 
4- यदि वर-कन्या के मंगल की स्थिति वक्री-नीच-अस्त हो और गुरु-शुक्र लग्न ,केन्द्रादि में बलवान राशि के हों , तो मंगल दोष शांत होता है। 


अब भ्रम की बात करते हैं - की मांगलिक व्यक्ति की शादी देरी से होती है !! जो कि ऐसा नहीं नहीं है , इसके पीछे का विज्ञान ये है की पहले के ज़माने में लोग जात-पात के कारन और कम्युनिकेशन , आने जाने के साधन के आभाव आदि में लोगो से संपर्क करने में देरी होती थी जिसके कारन शादी में देरी होती थी। दूसरा भ्रम - पडोसी या किसी परिचित की शादी तो गैर मांगलिक से हुई फिर भी शादी सफल है। इसके पीछे का तर्क है ज्योतिष का ज्ञान। जी आज जब मेरे अनुभव बहुत आता है कि माता-पिता बताते है हमारा बच्चा मांगलिक है!! किसी पंडित जी ने बताया है। जी की अधिकतर नहीं होते। कहने का अर्थ है की मांगलिक कुंडली कम होती है .मांगलिक कुंडली का अभाव भी पहले देर से शादी का कारन था। परन्तु आजकल हर कोई मांगलिक कुंडली वाला बता दिया जाता है। इसलिए आप किसी अच्छे जानकार ज्योतिषी को ही कुंडली बताइए। 

Thursday, 10 September 2015

जन्मकुंडली से कैसे चमकाएं अपना भाग्य:-


जन्मकुंडली में  लग्न से नौवां स्थान भाग्य का माना जाता है। यह स्थान तय करता है कि व्यक्ति का भाग्य कैसा होगा, कब चमकेगा और कब उसे प्रगति के मार्ग पर ले जाएगा। आइए जानते हैं पत्रिका के भाग्य भाव की रोचक जानकारी-
अगर पत्रिका में नवम भाव का स्वामी नवम भाव में ही हो तो ऐसा जातक भाग्य लेकर ही पैदा होता है। उसे जीवन में तकलीफ नहीं आती। यदि इस भाव के स्वामी रत्न का धारण विधिपूर्वक कर लें तो तेजी से भाग्य बढ़ने लगता है।
नवम भाव का स्वामी अष्टम भाव में हो तो भाग्य भाव से द्वादश होने के कारण व अष्टम अशुभ भाव में होने के कारण ऐसे जातकों को अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। अत: ऐसे जातक नवम भाव की वस्तु को अपने घर पर एक वस्त्र में रखें तो भाग्य बढ़ेगा।
नवम भाग्यवान का स्वामी षष्ट भाव में हो तो उसे अपने शत्रुओं से भी लाभ होता है। नवम षष्ट में उच्च का हो तो वो स्वयं कभी कर्जदार नहीं रहेगा न ही उसके शत्रु होंगे। ऐसी स्थिति में उसे उक्त ग्रह का नग धारण नहीं करना चाहिए।
* नवम भाव का स्वामी यदि चतुर्थ भाव में स्वराशि या उच्च का या मित्र राशि का हो तो वह उस ग्रह का रत्न धारण करें तो भाग्य में अधिक उन्नति होगी।
ऐसे जातकों को जनता संबंधित कार्यों में, राजनीति में, भूमि-भवन-मकान के मामलों में सफलता मिलती है। ऐसे जातक को अपनी माता का अनादर नहीं करना चाहिए।
नवम भाव का स्वामी यदि नीच राशि का हो तो उससे संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए। जबकि स्वराशि या उच्च का हो या नवम भाव में हो तो उस ग्रह से संबधित वस्तुओं के दान से बचना चाहिए।
नवम भाव में गुरु हो तो ऐसे जातक धर्म-कर्म को जानने वाला होगा। ऐसे जातक पुखराज धारण करें तो यश-प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
नवम भाव में स्वराशि का सूर्य या मंगल हो तो ऐसे जातक उच्च पद पर पहुंचते हैं। सूर्य व मंगल जो भी हों उससे संबंधित रंगों का प्रयोग करें तो भाग्य में वृद्धि होगी।
नवम भाव का स्वामी दशमांश में स्वराशि या उच्च का हो व लग्न में शत्रु या नीच राशि का हो तो उसे उस ग्रह का रत्न पहनना चाहिए तभी राज्य, व्यापार, नौकरी जिसमें हाथ डाले वह जातक सफल होगा।
नवम भाव की महादशा या अंतरदशा चल रही हो तो उस जातक को उक्त ग्रह से संबंधित रत्न अवश्य पहनना चाहिए। इस प्रकार हम अपने भाग्य में वृद्धि कर सफलता पा सकते हैं।